अपर्याप्त
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उन्हें
चाहने लगे हैं,
वो मन को भाने
लगे हैं |
पता चला है मन
को,
कि मन में उनका
रहना
काफ़ी नहीं है |
कुछ
करने से पहले सोचना,
क्या उनको पसंद आता,
सिर्फ़ ये सोचना भी,
काफ़ी नहीं है |
और कुछ बनाने के
बाद ये सवाल,
क्या ये उन्हें दिखा
पाते भी,
काफ़ी नहीं है |
अब जाकर ये समझ
आया,
कि मन-ही-मन
उनसे बातें करना,
अब और ज़रा भी,
काफ़ी नहीं है |
सो आज मन ने
पूछा है,
क्या वो भी करते
हैं,
ऐसे मन-ही-मन
बातें,
जैसे हम किया करते
हैं |
सो आज हमारा मन,
हो रहा प्रस्तुत,
उनके मन के रूप
में |
और उनका मन कर
रहा है,
हमारे मन से बात
|
क्या
माँगते हो तुम भी
टूटते तारों से,
दुआ में उठाते हो
अपने हाथ |
या कभी याद भी
नहीं करते,
दिनभर इधर-उधर के
काम,
और गहरी नींद पूरी
रात |
अजी,
ये कहाँ फँस गए,
कहाँ उलझ गया मन
|
इससे तो भले-चंगे
थे,
जब नहीं था इन
पराये विचारों का संग |
जी हाँ, ‘पराये’ विचार |
क्योंकि आज मन पर
उनका ही तो राज
है |
कल भी था, भला
माने या न माने
ये मन,
कि उन्हें चाहने लगे हैं,
वो मन को भाने
लगे हैं |
~A Singh
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